उम्मीद से कम बदलाव


indian education sysyem


कहा जाता है किसी भी क्षेत्र में विकास धीरे-धीरे होता है।  जिस प्रकार हमारी शिक्षा व्यवस्था के क्षेत्र में प्रगति की नींव आजादी के बाद सन् 1968 में रखी गई और समय-समय पर शिक्षा में बदलाव किए गए और इस बार भी कुछ बड़े बदलाव हुए लेकिन यह शिक्षा व्यवस्था भी कुछ महत्वपूर्ण घोषणाओं से वंचित रही है इस नई शिक्षा व्यवस्था में जिस प्रकार उच्च शिक्षा को नियमित करने व गुणवत्ता बढाने के लिए "हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया" का गठन का किया जाएगा इसी प्रकार प्राइमरी और इंटर कॉलेजों के लिए भी किसी संस्थान का गठन करना चाहिए क्योंकि अगर किसी पौधे की जड़ मजबूत न हो तो वह पेड़ मजबूत नहीं हो सकता और इसलिए हमें मूल शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए और जिस प्रकार प्राइमरी स्कूलों में  पाठ्यक्रमों के बदलाव के बारे में बात की गई है इन्हें पाठ्यक्रमों में बदलाव के साथ पढ़ाई के तरीकों में भी बदलाव की बात करनी चाहिए और इस दौर में शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़े बदलाव की मांग शिक्षा व्यवस्था को एक करने की थी जिस प्रकार राज्यों में एक समान शिक्षा व्यवस्था न होने से हमारे राज्यों में छात्रों की प्रतिभा पिछड़ रही है और अलग माध्यम में पड़ने की वजह से वह इतने अच्छे अंक प्राप्त नहीं कर पाते और उचित शैक्षिक संस्थानों में दाखिला नहीं ले पाते हैं जैसे उत्तर प्रदेश में यूपी बोर्ड में पढ़ने वाले छात्र अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वालों से औसतन कम अंक प्राप्त करते हैं जिससे उनका उच्च शैक्षिक संस्थानों में दाखिला नहीं हो पाता जिससे हमारे राज्य की प्रतिभा लुप्त हो जाती है और छोटे कस्बों और गांवों में पढ़ने वाले छात्रों की प्रतिभा सामने नहीं आती और इस बार की शिक्षा प्रणाली इन सभी मुख्य बदलाव से वंचित रही है लेकिन नई शिक्षा व्यवस्था में  छात्रों को डिग्री कोर्स में बीच में दूसरा विकल्प चुनने और बीच में पढ़ाई छोड़ने के बाद दोबारा से शुरू करने जैसे कई बड़े बदलाव को दरकिनार नहीं किया जा सकता जिससे देश के छात्रों को अपनी इच्छा की पढ़ाई के अनुरूप उचित अवसर प्रदान होगे

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